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शिव स्तोत्र
श्री सोमसुंदर अष्टकम् एक दिव्य स्तोत्र है, जो भगवान शिव के सोमसुंदर रूप की पूजा और आराधना के लिए है। यह स्तोत्र भगवान शिव के सुंदर रूप, उनकी महिमा और शक्ति का वर्णन करता है। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, शारीरिक स्वास्थ्य, और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
पाठ के लाभ -
श्री सोमसुंदर अष्टकम् का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। यह स्तोत्र नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है, मानसिक अशांति और शोक को समाप्त करता है, और जीवन में शांति और सुख प्रदान करता है। इसके साथ ही, यह स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर करता है और शारीरिक बल में वृद्धि करता है। यह भी माना जाता है कि इस स्तोत्र के पाठ से व्यक्ति के जीवन में आर्थिक उन्नति, समृद्धि और सफलता मिलती है।
पाठ विधि - श्री सोमसुंदर अष्टकम् का पाठ सुबह या शाम के समय, विशेषकर सोमवार या शिवरात्रि के दिन, भगवान शिव की प्रतिमा के सामने दीपक जलाकर और जल अर्पित करते हुए करना उत्तम माना जाता है। नियमित रूप से इस स्तोत्र का पाठ करने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन होते हैं और भक्त की सारी इच्छाएँ पूरी होती हैं।
इन्द्र उवाच ।
एकं ब्रह्माद्वितीयं च परिपूर्णं परापरम् ।
इति यो गीयते वेदैस्तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥ १ ॥
ज्ञातृज्ञानज्ञेयरूपं विश्वव्याप्यं व्यवस्थितम् ।
यं सर्वैरप्यदृश्योयस्तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥ २ ॥
अश्वमेधादियज्ञैश्च यः समाराध्यते द्विजैः ।
ददाति च फलं तेषां तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥ ३ ॥
यं विदित्वा बुधाः सर्वे कर्मबन्धविवर्जिताः ।
लभन्ते परमां मुक्तिं तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥ ४ ॥
देवदेवं यमाराध्य मृकण्डुतनयो मुनिः ।
नित्यत्वमगमत्सद्यस्तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥ ५ ॥
निजनेत्राम्बुजकृतं पूजया परितोष्ययम् ।
श्रीपतिर्लभते चक्रं तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥ ६ ॥
येन सर्वं जगत्सृष्टं रक्षितं संहृतं क्रमात् ।
नत्वं विज्ञानमानन्दं तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥ ७ ॥
यस्मात्परं चापरं च किञ्चिद्वस्तु न विद्यते ।
ईश्वरं सर्वभूतानां तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥ ८ ॥
यस्मै वेदाश्च चत्वारो नमस्यन्त वपुर्धराः ।
ईशानं सर्वविद्यानां तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥ ९ ॥
यस्य प्रणाममात्रेण सन्ति सर्वाश्च सम्पदः ।
सर्वसिद्धिप्रदं शम्भुं तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥ १० ॥
यस्य दर्शनमात्रेण ब्रह्महत्यादि पातकम् ।
अवश्यं नश्यति क्षिप्रं तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥ ११ ॥
उत्तमाङ्गं च चरणं ब्रह्मणा विष्णुनापि च ।
न दृश्यते यस्य यत्नस्तं वन्दे सोमसुन्दरम् ॥ १२ ॥
इति श्रीहालास्यमाहात्म्ये इन्द्रकृतं श्रीसोमसुन्दराष्टकम् ।
