श्री स्तोत्रम् (अग्निपुराणे)

श्री स्तोत्रम् (अग्निपुराणे)

श्री स्तोत्रम् (अग्निपुराण) अग्नि पुराण में वर्णित एक पवित्र स्तोत्र है, जिसमें देवी लक्ष्मी, विशेषकर महालक्ष्मी, की स्तुति और उनके कल्याणकारी गुणों का वर्णन किया गया है। इस स्तोत्र में माता को धन, वैभव, सौभाग्य, सुख-समृद्धि, परिवारिक सुख, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति देने वाली शक्ति के रूप में स्तुत किया गया है। श्रद्धा और शुद्ध मन से इसका पाठ करने से जीवन में आर्थिक और सामाजिक स्थिरता आती है। भय, दरिद्रता और नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं, कार्यों में सफलता और संतोष प्राप्त होता है, तथा घर-परिवार में मंगल, सौभाग्य और समृद्धि का वास होता है। यह स्तोत्र साधक के मन, वाणी और कर्मों में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक शक्ति का संचार करता है।

 

पुष्कर उवाच ।
राज्यलक्ष्मीस्थिरत्वाय यथेन्द्रेण पुरा श्रियः ।
स्तुतिः कृता तथा राजा जयार्थं स्तुतिमाचरेत् ॥ १ ॥

इन्द्र उवाच ।
नमस्ये सर्वलोकानां जननीमब्धिसम्भवाम् ।
श्रियमुन्निद्रपद्माक्षीं विष्णुवक्षःस्थलस्थिताम् ॥ २ ॥

त्वं सिद्धिस्त्वं स्वधा स्वाहा सुधा त्वं लोकपावनि ।
सन्ध्या रात्रिः प्रभा भूतिर्मेधा श्रद्धा सरस्वती ॥ ३ ॥

यज्ञविद्या महाविद्या गुह्यविद्या च शोभने ।
आत्मविद्या च देवि त्वं विमुक्तिफलदायिनी ॥ ४ ॥

आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्त्वमेव च ।
सौम्या सौम्यैर्जगद्रूपैस्त्वयैतद्देवि पूरितम् ॥ ५ ॥

का त्वन्या त्वामृते देवि सर्वयज्ञमयं वपुः ।
अध्यास्ते देव देवस्य योगिचिन्त्यं गदाभृतः ॥ ६ ॥

त्वया देवि परित्यक्तं सकलं भुवनत्रयम् ।
विनष्टप्रायमभवत् त्वयेदानीं समेधितम् ॥ ७ ॥

दाराः पुत्रास्तथागारं सुहृद्धान्यधनादिकम् ।
भवत्येतन्महाभागे नित्यं त्वद्वीक्षणान्नृणाम् ॥ ८ ॥

शरीरारोग्यमैश्वर्यमरिपक्षक्षयः सुखम् ।
देवि त्वद्दृष्टिदृष्टानां पुरुषाणां न दुर्लभम् ॥ ९ ॥

त्वमम्बा सर्वभूतानां देवदेवो हरिः पिता ।
त्वयैतद्विष्णुना चाम्ब जगद्व्याप्तं चराचरम् ॥ १० ॥

मानं कोशं तथा गोष्ठं मा गृहं मा परिच्छदम् ।
मा शरीरं कलत्रं च त्यजेथाः सर्वपावनि ॥ ११ ॥

मा पुत्रान् मा सुहृद्वर्गान् मा पशून् मा विभूषणम् ।
त्यजेथा मम देवस्य विष्णोर्वक्षःस्थलालये ॥ १२ ॥

सत्त्वेन सत्यशौचाभ्यां तथा शीलादिभिर्गुणैः ।
त्यजन्ते ते नराः सद्यः सन्त्यक्ता ये त्वयामले ॥ १३ ॥

त्वयावलोकिताः सद्यः शीलाद्यैरखिलैर्गुणैः ।
कुलैश्वर्यैश्च युज्यन्ते पुरुषा निर्गुणा अपि ॥ १४ ॥

स श्लाघ्यः स गुणी धन्यः स कुलीनः स बुद्धिमान् ।
स शूरः स च विक्रान्तो यस्त्वया देवि वीक्षितः ॥ १५ ॥

सद्यो वैगुण्यमायान्ति शीलाद्याः सकला गुणाः ।
पराङ्मुखी जगद्धात्री यस्य त्वं विष्णुवल्लभे ॥ १६ ॥

न ते वर्णयितुं शक्ता गुणान् जिह्वापि वेधसः ।
प्रसीद देवि पद्माक्षि माऽस्मांस्त्याक्षीः कदाचन ॥ १७ ॥

पुष्कर उवाच ।
एवं स्तुता ददौ श्रीश्च वरमिन्द्राय चेप्सितम् ।
सुस्थिरत्वं च राज्यस्य सङ्ग्रामविजयादिकम् ॥ १८ ॥

स्वस्तोत्रपाठश्रवणकर्तॄणां भुक्तिमुक्तिदम् ।
श्रीस्तोत्रं सततं तस्मात्पठेच्च शृणुयान्नरः ॥ १९ ॥

इत्यग्निपुराणे सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याये श्रीस्तोत्रम् ।


लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

त्रिलोक , वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।

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