श्री वल्लभभावाष्टकम् १

श्री वल्लभभावाष्टकम् १

पतिः श्रीवल्लभोऽस्माकं गतिः श्रीवल्लभस्सदा ।
मतिः श्रीवल्लभे ह्यास्तां रतिः श्रीवल्लभेऽस्तु मे ॥ १ ॥

वृत्तिः श्रीवल्लभा यैव कृतिः श्रीवल्लभार्थिनी ।
दर्शनं श्रीवल्लभस्य स्मरणं वल्लभप्रभोः ॥ २ ॥

तत्प्रसादसुमाघ्राण-मस्तूच्छिष्टरसाग्रहः ।
श्रवणं तद्गुणानां हि स्मरणं तत्पदाब्जयोः ॥ ३ ॥

मननं तन्महत्त्वस्य सेवनं करयोर्भवेत् ।
तत्स्वरूपान्तरो भोगो गमनं तस्य सन्निधौ ॥ ४ ॥

तदग्रे सर्वदा स्थानं सङ्गस्तत्सेवकैस्सदा ।
तद्वार्तातिरुचिर्निष्ठा भूयात्तद्वाक्यमात्रगा ॥ ५ ॥

श्रद्धा तदेकसम्बन्धे विश्वासस्तत्पदाब्जयोः ।
दास्यं तदीयमेवास्तु भूयात्तच्चरणाश्रयः ॥ ६ ॥

मस्तके श्रीवल्लभोऽस्तु हृदि तिष्ठतु वल्लभः ।
अभितः श्रीवल्लभोऽस्तु सर्वं श्रीवल्लभो मम ॥ ७ ॥

नमः श्रीवल्लभायैव दैन्यं श्रीवल्लभे सदा ।
प्रार्थना श्रीवल्लभेऽस्तु तत्पदाधीनता मम ॥ ८ ॥

एतदष्टकपाठेन श्रीवल्लभपदाम्बुजे ।
भवेद्भावो विनायासं भक्तिमार्गवृतात्मनाम् ॥ ९ ॥

इति श्री हरिदासोदितं श्रीवल्लभभावाष्टकम् ।


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