श्री वल्लभेश करावलम्ब स्तोत्रम्

श्री वल्लभेश करावलम्ब स्तोत्रम्

ओमङ्घ्रिपद्ममकरन्दकुलामृतं ते
नित्यं भजन्ति दिवि यत्सुरसिद्धसङ्घाः ।
ज्ञात्वामृतं च कणशस्तदहं भजामि
श्रीवल्लभेश मम देहि करावलम्बम् ॥ १ ॥

श्रीमातृसूनुमधुना शरणं प्रपद्ये
दारिद्र्यदुःखशमनं कुरु मे गणेश ।
मत्सङ्कटं च सकलं हर विघ्नराज
श्रीवल्लभेश मम देहि करावलम्बम् ॥ २ ॥

गङ्गाधरात्मज विनायक बालमूर्ते
व्याधिं जवेन विनिवारय फालचन्द्र ।
विज्ञानदृष्टिमनिशं मयि सन्निधेहि
श्रीवल्लभेश मम देहि करावलम्बम् ॥ ३ ॥

गण्यं मदीयभवनं च विधाय दृष्ट्या
मद्दारपुत्रतनयान् सहजांश्च सर्वान् ।
आगत्य चाशु परिपालय शूर्पकर्ण
श्रीवल्लभेश मम देहि करावलम्बम् ॥ ४ ॥

णाकारमन्त्रघटितं तव यन्त्रराजं
भक्त्या स्मरामि सततं दिश सम्पदो मे ।
उद्योगसिद्धिमतुलां कवितां च लक्ष्मीं
श्रीवल्लभेश मम देहि करावलम्बम् ॥ ५ ॥

पादादिकेशमखिलं सुधया च पूर्णं
कोशाग्निपञ्चकमिदं शिवभूतबीजम् ।
त्वद्रूपवैभवमहो जनता न वेत्ति
श्रीवल्लभेश मम देहि करावलम्बम् ॥ ६ ॥

तापत्रयं मम हरामृतदृष्टिवृष्ट्या
पापं व्यपोहय गजानन चापदो मे ।
दुष्टं विधातृलिखितं परिमार्जयाशु
श्रीवल्लभेश मम देहि करावलम्बम् ॥ ७ ॥

ये त्वां विदन्ति शिवकल्पतरुं प्रशस्तं
तेभ्यो ददासि कुशलं निखिलार्थलाभम् ।
मह्यं तदैव सकलं दिश वक्रतुण्ड
श्रीवल्लभेश मम देहि करावलम्बम् ॥ ८ ॥

नादान्तवेद्यममलं तव पादपद्मं
नित्यं भजे विबुध षट्पदसेव्यमानम् ।
सत्ताशमाद्यमखिलं दिश मे गणेश
श्रीवल्लभेश मम देहि करावलम्बम् ॥ ९ ॥

मोदामृतेन तव मां स्नपयाशु बालं
पापाब्धिपङ्कलुलितं च सहायहीनम् ।
वस्त्रादिभूषणधनानि च वाहनादीन्
श्रीवल्लभेश मम देहि करावलम्बम् ॥ १० ॥

श्रीवल्लभेशदशकं हठयोगसाध्यं
हेरम्ब ते भगवतीश्वर भृङ्गनादम् ।
शृत्वानिशं श्रुतिविदः कुलयोगिनो ये
भूतिप्रदं भुवि जनाः सुधियो रमन्ताम् ॥ ११ ॥


लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक

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