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गणेश स्तोत्र
श्री विनायक स्तवराज भगवान श्रीगणेश की एक अत्यंत प्रभावशाली और प्राचीन स्तुति है, जिसे विनायक स्तुतियों का “राज” यानी श्रेष्ठ माना गया है। इस स्तवराज में गणपति के विविध दिव्य रूपों, गुणों, शक्तियों और कृपा का वर्णन मिलता है। यह स्तुति साधक को विघ्न-विनाशक, बुद्धि-प्रदाता और कल्याणकारी श्रीगणेश से सीधे जोड़ती है। इसे अत्यंत शुभ, शक्तिशाली और मनोकामना पूरी करने वाला स्तोत्र माना जाता है।
जीवन से विघ्न, बाधाएं और रुकावटें दूर होती हैं।
मन, बुद्धि और चित्त में एकाग्रता तथा स्पष्टता बढ़ती है।
नकारात्मक ऊर्जा कम होती है और सकारात्मकता बढ़ती है।
कार्य सिद्धि, धन-समृद्धि और सौभाग्य में वृद्धि होती है।
विद्यार्थी, साधक और कर्मयोगी को आत्मविश्वास, स्मरण-शक्ति और निर्णय क्षमता मिलती है।
मानसिक अशांति, भय और तनाव कम होकर शांति व स्थिरता प्राप्त होती है।
गणपति का दिव्य संरक्षण मिलता है और आध्यात्मिक उन्नति तेज होती है।
नियमित श्रद्धापूर्वक पाठ करने से श्री विनायक स्तवराज साधक के जीवन में संपूर्ण मंगल, बल, बुद्धि और सफलता प्रदान करता है।
बीजापूरगदेक्षुकार्मुकरुजा चक्राब्जपाशोत्पल-
-व्रीह्यग्रस्वविषाणरत्नकलशप्रोद्यत्कराम्भोरुहः ।
ध्येयो वल्लभया सपद्मकरयाश्लिष्टोज्ज्वलद्भूषया
विश्वोत्पत्तिविपत्तिसंस्थितिकरो विघ्नेश इष्टार्थदः ॥ १ ॥
नमस्ते सिद्धिलक्ष्मीश गणाधिप महाप्रभो ।
विघ्नेश्वर जगन्नाथ गौरीपुत्र जगत्प्रभो ॥ २ ॥
जय विघ्नेश्वर विभो विनायक महेश्वर ।
लम्बोदर महाबाहो सर्वदा त्वं प्रसीद मे ॥ ३ ॥
महादेव जगत्स्वामिन् मूषिकारूढ शङ्कर ।
विशालाक्ष महाकाय मां त्राहि परमेश्वर ॥ ४ ॥
कुञ्जरास्य सुराधीश महेश करुणानिधे ।
मातुलुङ्गधर स्वामिन् गदाचक्रसमन्वित ॥ ५ ॥
दशबाहो महाराज गजवक्त्र चतुर्भुज ।
शूर्पकर्ण महाकर्ण गणनाथ प्रसीद मे ॥ ६ ॥
शङ्खशूलसमायुक्त बीजापूरसमन्वित ।
इक्षुकार्मुकसम्युक्त पद्महस्त प्रसीद मे ॥ ७ ॥
नानाभरणसम्युक्त रत्नकुम्भकर प्रभो ।
सर्गस्थितिलयाधीश परमात्मन् जय प्रभो ॥ ८ ॥
अनाथनाथ विश्वेश विघ्नसङ्घविनाशन ।
त्रयीमूर्ते सुरपते ब्रह्मविष्णुशिवात्मक ॥ ९ ॥
त्रयीगुण महादेव पाहि मां सर्वपालक ।
अणिमादिगुणाधार लक्ष्मीश्रीविष्णुपूजित ॥ १० ॥
गौरीशङ्करसम्पूज्य जय त्वं गणनायक ।
रतिमन्मथसंसेव्य महीभूदारसंस्तुत ॥ ११ ॥
ऋद्ध्यामोदादिसंसेव्य महागणपते जय ।
शङ्खपद्मादिसंसेव्य निरालम्ब निरीश्वर ॥ १२ ॥
निष्कलङ्क निराधार पाहि मां नित्यमव्यय ।
अनाद्य जगतामाद्य पितामहसुपूजित ॥ १३ ॥
धूमकेतो गणाध्यक्ष महामूषकवाहन ।
अनन्तपरमानन्द जय विघ्नेश्वरेश्वर ॥ १४ ॥
रत्नसिंहासनासीन किरीटेन सुशोभित ।
परात्पर परेशान परपूरुष पाहि माम् ॥ १५ ॥
निर्द्वन्द्व निर्गुणाभास जपापुष्पसमप्रभ ।
सर्वप्रमथसंस्तुत्य त्राहि मां विघ्ननायक ॥ १६ ॥
कुमारस्य गुरो देव सर्वैश्वर्यप्रदायक ।
सर्वाभीष्टप्रद स्वामिन् सर्वप्रत्यूहनाशक ॥ १७ ॥
शरण्य सर्वलोकानां शरणागतवत्सल ।
महागणपते नित्यं मां पालय कृपानिधे ॥ १८ ॥
एवं श्रीगणनाथस्य स्तवराजमनुत्तमम् ।
यः पठेच्छृणुयान्नित्यं प्रत्यूहैः स विमुच्यते ॥ १९ ॥
अश्वमेधसमं पुण्यफलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ।
वशीकरोति त्रैलोक्यं प्राप्य सौभाग्यमुत्तमम् ॥ २० ॥
सर्वाभीष्टमवाप्नोति शीघ्रमेव सुदुर्लभम् ।
महागणेशसान्निध्यं प्राप्नोत्येव न संशयः ॥ २१ ॥
इति श्रीरुद्रयामले श्रीविनायकस्तवराजः सम्पूर्णम् ।
