
क्या है भगवद् गीता पढ़ने का सही नियम ? गीता के किस अध्याय में क्या है ?

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पूजा
क्या है भगवद् गीता पढ़ने का सही नियम ? गीता के किस अध्याय में क्या है ?
मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को गीता जयंती मनाई जाएगी। श्रीमद्भागवत गीता जीवन ग्रंथ है। वेद व्यास द्वारा लिखित महाभारत का एक अंश है, गीता। गीता भगवान कृष्ण के वे संदेश है, जो उन्होंने अर्जुन को दिए थे। गीता में भगवान ने कर्म, भक्ति, योग के सिद्धांतों को वर्णन किया है। गीता केवल हमें यह सिखाती है कि व्यक्ति को केवल अपने काम और कर्म पर ध्यान देना चाहिए। साथ ही कर्म करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम जो भी कर्म कर रहे हैं, उसका फल हमें कभी ना कभी जरूर मिलेगा। परिणाम को लेकर चिंता नहीं करनी चाहिए। गीता हमें बताती है कि जीवन क्या है और इसे कैसे जीना चाहिए? आत्मा और परमात्मा का मिलन कैसे होते है, अच्छे और बुरे की समझ क्यों जरूरी है? लेकिन गीता पढ़ने के कुछ नियम है, जानिए क्या है वे नियम, साथ ही जानें गीता के किस अध्याय में क्या लिखा है
कैसे समझें गीता
गीता पढ़ने का नियम बेहद सरल है। सबसे पहले आप इसे पढ़ें या सुनें। पहली बार में अक्सर ही गीता समझ नहीं आता है, इसलिए आप दूसरी बार फिर पढ़ें, इस समय आप पढ़ने के साथ मनन करें। इस मनन के आधार पर आप अपने विचार बनाएं। इन विचारों को लोगों से साझा करें और उनके अनुभव पूछें। अपने अनुभव भी साझा करें। इससे आप भगवद् गीता के संदेशों को स्पष्ट समझ पाएंगे। कुछ विद्वान मानते हैं कि गीता पढ़ना कभी रोकना ही नहीं चाहिए। क्योंकि कई बार मन को उलझाने वाले सवालों के जवाब गीता से मिल जाते हैं।
श्रीमद्भगवत गीता पाठ के नियम
भगवत गीता पढ़ने के लिए हमेशा ही सबसे उत्तम माना जाता है। इस समय मन, मस्तिष्क और वातावरण में शांति व सकारात्मकता होती है।
गीता का पाठ हमेशा स्नान के बाद और शांत चित्त मन से ही करना चाहिए। पूजा घर में इसे पढ़ना काफी अच्छा माना जाता है।
पाठ करते समय बीच-बीच में इधर-उधर की बातें नहीं करनी चाहिए और न ही किसी कार्य के लिए बार-बार उठना चाहिए।
साफ-सफाई वाले स्थान और जमीन पर आसन बिछाकर ही गीता का पाठ करना चाहिए।
गीता के प्रत्येक अध्याय को शुरू करने से पहले और बाद भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान जरूर करना चाहिए।
हो सकें तो पहले अकेले गीता पाठ करें और दूसरे बार में इसे परिवार वालों के साथ पढ़ें।
गीता के किस अध्याय में क्या है
- - गीता का पहला अध्याय अर्जुनविषादयोग नाम से है। इस अध्याय में अर्जुन की उलझन को बताया गया है।
- दूसरे अध्याय का नाम सांख्ययोग है। यहां श्रीकृष्ण अर्जुन को कायरता से बाहर आने की बात कहते हैं। साथ ही वे कहते हैं कि आत्मा अमर है।
- तीसरे अध्याय का नाम कर्मयोग है। यहां भगवान कृष्ण अर्जुन को केवल अपना कर्म करने की बात समझाते हैं।
- चौथे अध्याय का नाम ज्ञान कर्म संन्यास योग है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण महान योगियों और यज्ञों का फल बताते हैं। यहां यज्ञ का एक मतलब कर्म से ही है।
- - पांचवें अध्याय का नाम कर्म संन्यास योग है। यह अध्याय कर्म के ही सिद्धांत को और गूढ़ तरीके से बताता है।
- छठे अध्याय का नाम आत्मसंयम योग है। इसमें ध्यान की महीमा बताई गई है।
- सातवें अध्याय का नाम ज्ञान-विज्ञान योग है। इसमें ईश्वर के स्वरूप और उनके भक्तों की जिज्ञासा की जानकारी दी गई है।
- आठवां अध्याय अक्षर ब्रह्म योग है। इसमें अर्जुन के प्रश्न और श्रीकृष्ण के उत्तर है। ये सभी प्रश्न ब्रह्म और आध्यात्म को लेकर है।
- नवां अध्याय राजविद्याराजगुह्य योग है। इसमें राक्षसी प्रवृत्ति के लोगों का वर्णन है।
- दसवां अध्याय विभूति योग है। इसमें भगवान अपनी दिव्य सत्ता की जानकारी देते हैं।
- ग्यारहवां अध्याय विश्वरूप दर्शन योग है। इसमें भगवान अपने विराट रूप और चतुर्भूज रूप का दर्शन करवाते हैं।
- बारहवां अध्याय भक्तियोग है। इसमें भगवान की प्राप्ति का मार्ग बताया गया है।
- तेरहवां अध्याय क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग है। इसमें स्थिति, ज्ञान, परमात्मा, पंच तत्वों का रहस्यमयी ज्ञान है।
- चौदहवां अध्याय गुणत्रविभाग योग है। इस अध्याय में भगवद् प्राप्ति के उपाय है।
- पंद्रहवां अध्याय पुरुषोत्तम योग है। इसमें संसार की बात कहते हुए भगवान की प्राप्ति के उपाय बताए हैं।
- सोलहवां अध्याय देवासुरसंपद्विभाग योग है। इसमें शास्त्र विरुद्ध आचरण करने वालों की दुर्गति के बारे में बात की गई है।
- सत्रहवां अध्याय श्रद्धात्रय विभाग नाम से योग है। इसमें आहार, तप, ज्ञान और दान की महिमा बताई गई है।
-अठारवां अध्याय मोक्ष संन्यास योग है। इसमें ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि और वैराग्य की बात कही गई है।
लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक
त्रिलोक, वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।
प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।