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मंत्र
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
परम ब्रह्म, जो सृष्टि का आदि और अंत है, वह हर दृष्टि से पूर्ण और सम्पूर्ण है। उसी पूर्ण से यह जगत उत्पन्न हुआ है, अतः यह भी पूर्ण है। सृष्टि की रचना के पश्चात भी वह परमात्मा अचल, अनंत और अपरिवर्तित रहता है। यह मंत्र हमें सिखाता है कि सम्पूर्ण सृष्टि में दिव्यता और पूर्णता निहित है। उस अनंत चेतना से हम सभी को शांति और संतुलन की प्राप्ति हो।
ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हे परमात्मा! हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो। हमें सच्चे ज्ञान और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दो।
यह मंत्र मन को शुद्ध करता है, चेतना को जागृत करता है, और आत्मा को उच्च अवस्था की ओर अग्रसर करता है।
ॐ नमः शिवाय।
इस मंत्र के जप से मन शुद्ध होता है, भय दूर होते हैं, और आंतरिक शांति तथा शिव-चेतना से एकत्व की अनुभूति होती है।
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
इन्द्र देव हमें बल और समृद्धि प्रदान करें। पूषा देव हमें ज्ञान और विवेक का आशीर्वाद दें। विष्णु भगवान, जो गरुड़ पर आरूढ़ हैं, हमें सभी संकटों से रक्षा करें। बृहस्पति देव हमें स्वास्थ्य, समृद्धि और शुभ बुद्धि प्रदान करें। सभी दिशाएँ हमारे लिए मंगलकारी हों और हमारे जीवन में शांति, पवित्रता और संतुलन बना रहे।
इस मंत्र के जप से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है, सफलता, सुख-समृद्धि और शुभ फल प्राप्त होते हैं। यह जीवन में संतुलन, सौभाग्य और आंतरिक शांति लाने वाला शक्तिशाली वैदिक मंत्र है।
