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व्रत
अमान्त हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार, भाद्रपद माह (पूर्णिमान्त आश्विन माह) की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी, विघ्नराज संकष्टी के रूप में मनायी जाती है। इस अवसर पर भगवान विघ्नराज का पूजन एवं व्रत किया जाता है। भगवान विघ्नराज, भगवान गणेश के अष्टविनायक रूपों में सातवें स्वरूप हैं। गणेश जी के इस रूप का पूजन करने से समस्त प्रकार के विघ्नों का निवारण होता है तथा कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
हिन्दु पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय गणेश जी विघ्नासुर का अन्त करने हेतु प्रकट हुये किन्तु गणेश जी की शक्ति एवं पराक्रम का दर्शन कर विघ्नासुर ने उनकी शरण ग्रहण कर ली। विघ्नासुर द्वारा क्षमा-याचना एवं स्तुति करने पर गणेश जी प्रसन्न हुये तथा उसे वरदान माँगने को कहा। विघ्नासुर ने वरदान स्वरूप गणेश जी से अपने नाम के साथ उसका नाम जोड़ने का आग्रह किया। अतः वरदान की पूर्ति हेतु भगवान गणेश विघ्नराज के नाम से प्रतिष्ठित हुये।
मुद्गल पुराण में भगवान विघ्नराज के प्रादुर्भाव से सम्बन्धित वर्णन के अनुसार ममतासुर नामक दैत्य के संहार हेतु गणेश जी स्वयं भगवान विघ्नराज के रूप में प्रकट हुये थे। द्वापरयुग में भगवान कृष्ण ने अपने अपहृत पौत्र अनिरुद्ध की प्राप्ति हेतु लोमश ऋषि के सुझाव पर यह उत्तम व्रत किया था। व्रत के फलस्वरूप बाणासुर का संहार कर उन्होंने अनिरुद्ध को मुक्त कराया था।
