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व्रत
अमान्त हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार, चैत्र माह तथा पूर्णिमान्त पञ्चाङ्ग के वैशाख माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को विकट संकष्टी के रूप में मनाया जाता है। भगवान गणेश के अष्टविनायक रूपों में से एक विकट रूप भी है। समस्त प्रकार के ज्ञात-अज्ञात भय, रोग, शोक एवं दुर्घटनाओं से मुक्ति हेतु भगवान विकट की पूजा की जाती है। भगवान विकट अपने भक्तों को अपराजेयता एवं निर्भयता प्रदान करते हैं तथा घोर से घोर महासंकटों में भक्तों की रक्षा करते हैं। भगवान विकट का यह पूजन एवं व्रत न केवल व्यक्ति को निर्भीक बनाता है अपितु उसे विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करने का साहस भी प्रदान करता है।
मुद्गल पुराण के अनुसार कामासुर नामक दैत्य का दमन करने हेतु भगवान गणेश, विकट रूप में अवतरित हुये थे। भगवान विकट का स्वरूप अत्यन्त विशाल है। वे विभिन्न शस्त्रों को धारण किये हुये मयूर पर आरूढ़ रहते हैं। मयूर पर आरूढ़ होने के कारण उन्हें मयूरेश भी कहा जाता है। यहाँ मयूर को माया का प्रतीक माना गया है। भगवान विकट की गदा के मात्र एक प्रहार से ही कामासुर परास्त हो गया था। अपने प्राणों की रक्षा हेतु उसने भगवान विकट की शरण में जाने का निश्चय किया जिसके कारण समस्त लोकों को उसके त्रास से मुक्ति प्राप्त हुयी।
