
होलाष्टक क्या है ? इस दौरान क्या करें, क्या नहीं ?

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पूजा
होलाष्टक क्या है ? इस दौरान क्या करें, क्या नहीं ?
होलाष्टक एक विशेष समय है, जो फाल्गुन माह के शुक्ल अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक चलता है। यह आठ दिनों का समय होता है। जब सभी शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं, जैसे विवाह, गृहप्रवेश, नई दुकान खोलना आदि कार्य इन दिनों में नहीं किए जाते हैं। यह समय होली के आसपास होता है, इसलिए इसे होलाष्टक कहा जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार इस समय भगवान शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। जिससे होलाष्टक की शुरुआत हुई। कुछ मान्यताओं के अनुसार वहीं, होलाष्टक का संबंध हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद की कथा से भी है.
साल 2025 में होलाष्टक कब?
कुछ विशेष साधक कहते हैं कि होलाष्टक का समय एक आध्यात्मिक प्रक्रिया का हिस्सा भी माना जाता है। इन आठ दिनों में व्यक्ति ध्यान और साधना से ज्ञान की ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है। होलाष्टक न केवल होली की तैयारियों का समय है, बल्कि इसे धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। साल 2025 में होलाष्टक का प्रारंभ 7 मार्च 2025 को शुक्रवार के दिन होगा और इसका समापन 13 मार्च 2025 को गुरुवार को होलिका दहन के साथ होगा। इन 8 दिनों को मुख्य रूप से उत्तर भारत और पंजाब के क्षेत्रों में अधिक महत्व दिया जाता है। होलाष्टक का समापन रंग और गुलाल के साथ होली के त्योहार पर होता है। इस समय में बसंत ऋतु का आगमन होता है। सर्दियां खत्म होने लगती हैं और गर्मियां दस्तक देती हैं। फूलों की महक से प्रकृति उत्सवमय हो जाती हैं।
होली पूजा की तैयारी करते हैं लोग
होलाष्टक के दौरान कुछ कार्य आरंभ होते हैं। जैसे होलिका दहन के लिए लकड़ियां इकट्ठा करना। होलिका पूजन के लिए स्थान का चयन और होली का डंडा स्थापित करना गांवों में यह परंपरा अब भी जीवित है। गांव की चौपाल या चौराहे पर होलिका दहन के लिए स्थान चुना जाता है। वहां रोज लकड़ियां डाली जाती हैं, जो होलिका दहन के दिन तक एक बड़ा ढेर बन जाता है। होलाष्टक के समय दान और व्रत का भी महत्व है। इस दौरान वस्त्र, अन्न, धन आदि का दान करना शुभ माना जाता है। यह कष्टों से मुक्ति और अनुकूल फल देता है।
तीन कारणों से अशुभ है होलाष्टक
होलाष्टक के दौरान 8 दिनों में कोई भी मांगलिक कार्यों को करना निषेध होता है। इस समय मांगलिक कार्य करना अशुभ माना जाता है। होलाष्टक के अशुभ होने के 3 कारण बताए गए हैं। इसके संबंध में दो पौराणिक कथाएं हैं। पहली भक्त प्रह्लाद और दूसरी कामदेव से जुड़ी हुई हैं। तीसरा कारण मौसम से जुड़ा हुआ है।
प्रहलाद की कहानी
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा हिरण्यकश्यपु ने अपने बेटे प्रह्लाद को भगवान श्री विष्णु की भक्ति से दूर करने के लिए आठ दिन तक कठिन यातनाएं थीं। आठवें दिन वरदान प्राप्त होलिका जो हिरण्यकश्यप की बहन थी वो भक्त प्रहलाद को गोद में लेकर बैठी और जल गई थी लेकिन भक्त प्रहलाद बच गए थे।
रति कामदेव की कहानी
कहते हैं कि देवताओं के कहने पर कामदेव ने शिव की तपस्या भंग करने के लिए कई दिनों में कई तरह के प्रयास किए थे। तब भगवान शिव ने फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि को कामदेव को भस्म कर दिया था। कामदेव की पत्नी रति ने उनके अपराध के लिए शिवजी से क्षमा मांगी, तब भोलेनाथ ने कामदेव को पुनर्जीवन देने का आश्वासन दिया।
मौसम भी एक कारण
ज्योतिषियों के अनुसार होलाष्टक का प्रभाव तीर्थ क्षेत्र में नहीं मान जाता है, लेकिन इन आठ दिनों में मौसम परिवर्तित हो रहा होता है, व्यक्ति रोग की चपेट में आ सकता है और ऐसे में मन की स्थिति भी अवसाद ग्रस्त रहती है। इसलिए शुभकार्य वर्जित माने गए हैं। होलाष्टक के आठ दिनों को व्रत, पूजन और हवन की दृष्टि से अच्छा समय माना गया है।
लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक
त्रिलोक, वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।
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