
महिला नागा साधु - जानिए कैसी है इनकी रहस्यमयी दुनिया

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महिला नागा साधु - जानिए कैसी है इनकी रहस्यमयी दुनिया
साल 2025 की शुरुआत दुनिया के सबसे बड़े सनातनी महापर्व से हो रही है। प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर होने वाले इस महाकुंभ पर्व में चालीस करोड़ लोगों के आने की संभावना बन रही है। महाकुंभ में लोग विभिन्न साधुओं के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचते हैं। सनातन धर्म में संतों का आशीर्वाद लेना अत्यधिक शुभता का प्रतीक है।
कुंभ में आने वाले नागा साधु लोगों के लिए सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद होते हैं। कुंभ की कल्पना तक नागा साधुओं के बिना नहीं की जा सकती है। नागा साधुओं का जीवन आम साधुओं से बिल्कुल अलग होता है। कुंभ में पुरुष नागा साधु की तरह ही स्त्रियां भी नागा साधू होती है, जिनका जीवन पूरी तरह से ईश्वर को समर्पित रहता है। जानते हैं महिला नागा साधुओं के जीवन से जुड़ी कुछ विशेष बातें -
कठिन होता है महिला साधु
नागा साधुओं की रहस्यमयी दुनिया सभी को आकर्षित करती है। महिला नागा साधु का जीवन भी सबसे निराला और अलग होता है। ये नागा साधु गृहस्थ जीवन से दूर रहती है और दिनभर शिव नाम का जाप करती है। दिन की शुरुआत तपस्या से करती हैं और रात को भी प्रभु नाम स्मरण करते हुए आराम करती है। इन्हें आम लोगों से कोई विशेष मतलब नहीं होता है, लेकिन आम लोगों के लिए इनके मन में वात्सल्य हमेशा बना रहता है।
कौन बनाता है नागा साधु
महिला नागा साधु बनने के बाद लोग इन्हें माताजी या दीदीजी कहकर पुकारते हैं। ये महिला साधु माई बाड़ा में रहती है। इसे अब विस्तृत रूप देने के बाद दशनाम संन्यासिनी अखाड़ा का नाम दिया गया है। आपको बता दें कि नागा का मतलब दिगंबर यानी बिना कपड़ों के रहना नहीं है। साधु-संतों में नागा एक पदवी होती है। साधुओं में वैष्णव जो विष्णु की पूजा करते हैं, शैव जिन्हें शिव प्रिय होते हैं और उदासीन संप्रदाय हैं। इन तीनों संप्रदायों के अखाड़े नागा साधु बनाते हैं।
ऐसे बनते हैं महिला नागा साधु
महिला नागा साधुओं के बनने की प्रक्रिया के बारे में जितनी कठिन होती है, उतनी ही कठिन महिला नागा साधुओं की जिंदगी भी होती है। नागा साधु बनने कि लिए इनको कड़ी परीक्षा से गुजरना होता है। नागा साधु या संन्यासनी बनने के लिए करीब बिना मसाले के भोजन के दस साल से ज्यादा समय तक ब्रह्मचर्य का पालन जरूर होता है।
नागा साधु बनने लिए किसी भी महिला को अपने गुरु को यकीन दिलाना होता है कि वह इसके लिए योग्य हैं और अब ईश्वर के प्रति समर्पित हो चुकी हैं। इसके बाद गुरु ही उन्हें नागा साधु बनने की स्वीकृति देते हैं। नागा साधु बनने के बाद ये महिलाएं किसी भी प्रकार के रिश्ते से मुक्त हो जाती है और केवल ईश्वर भक्ति में ही रहती है। नागा साधु बनने से पहले मुंडन कराना पड़ता है। कोई भी गुरु पहले महिला के पहले के जीवन के बारे में जानता है। नागा साधु बनने से पहले महिला को जीवित रहते अपना पिंडदान करना होता है और मुंडन कराना पड़ता है।
अखाड़े में मिलता है पूरा सम्मान
इन सभी प्रक्रिया के बाद महिला को नदी में स्नान कराया जाता है। महिला नागा साधु पूरा दिन भगवान का जाप करती हैं और सुबह ब्रह्ममुहुर्त में उठ कर पूजा करती हैं। अक्सर शाम में ये महिलाएं दत्तात्रेय भगवान की पूजा करती हैं। दोपहर में भोजन के बाद वह शिवजी का जाप करती हैं। अखाड़े में महिला नागा साधु को पूरा सम्मान दिया जाता है।
कुंभ मेले के दौरान नागा साधुओं के साथ ही महिला साधु भी शाही स्नान करती हैं। हालांकि, पुरुष नागा के स्नान करने के बाद वह नदी में स्नान करती हैं। अखाड़े की महिला नागा साध्वियों को माई, अवधूतानी या नागिन कहकर बुलाया जाता है। लेकिन माई या नागिनों को अखाड़े के किसी प्रमुख पद के लिए नहीं चुना जाता है।
लेखक के बारे में: टीम त्रिलोक
त्रिलोक, वैदिक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र और धार्मिक अध्ययनों के प्रतिष्ठित विषय विशेषज्ञों (Subject Matter Experts) की एक टीम है। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संदर्भ के समन्वय पर केंद्रित, त्रिलोक टीम ग्रहों के प्रभाव, आध्यात्मिक अनुष्ठानों और सनातन धर्म की परंपराओं पर गहन और शोध-आधारित जानकारी प्रदान करती है।
प्रामाणिकता के प्रति समर्पित, इस टीम में प्रमाणित ज्योतिषी और वैदिक विद्वान शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक लेख शास्त्र-सम्मत और तथ्यपरक हो। सटीक राशिफल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक पर्वों की विस्तृत जानकारी चाहने वाले पाठकों के लिए त्रिलोक एक विश्वसनीय और आधिकारिक स्रोत है।